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Description
जवाब दो विक्रमादित्य
अपनी बात
पता नहीं, कौन-कब एक बात शुरू कर देता है और वह जंगल की आग की तरह फैल जाती है। पिछले बीस सालों से “विवादास्पद” एक ऐसा ही विशेषण है जो न जाने कहाँ से आकर मेरे नाम के साथ चिपक गया है। अब तो हालत यह है कि अगर यह न हो तो खुद मुझे ऐसा अटपटा लगता है जैसे बिना शेव किए सारा दिन…हालाँकि यहाँ दिये गये साक्षात्कारों में अनेक जगह झुँझलाकर मैंने सफाई देने की कोशिश भी की है। आश्चर्य यह भी होता है कि लगभग डेढ़-सौ सालों से विवेक और तर्क के माहौल में बिताने के बावजूद क्या हमारा बुद्धिजीवी-वर्ग अभी भी इतना यथास्थितिवादी है कि कोई भी नई बात, नई व्याख्या, या अनदेखा प्रश्न उसे विचलित कर देता है और उस पर विचार करने की बजाय वह प्रश्नकर्ता को ही गरियाने लगता है। मूलतः हममें से अधिकांश बौद्धिक आलस्य, निष्प्रश्न आस्था और परम्परागत सोच में बने रहने की निश्चिन्तता के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि उससे अलग कुछ भी नहीं सुनना चाहते…इन्हें नींद से झकझोरने के लिए काश मैं भी कबीर और आचार्य राजनीश की तरह बेलौस मुँहफट हो पाता। भारत में बौद्धिक तेजस्विता अनेक चिन्तकों का गुण रही है, मगर प्रश्नातीत आस्था, बौद्धिक अन्धविश्वास और वैचारिक प्रमाद को सीधा निशाना बहुत कम लोगों ने बनाया है।
इन साक्षात्कारों को लेकर ऐसा कोई मुग़ालता मुझे नहीं है। वे सामान्य बुद्धि की तत्काल-प्रतिक्रियाओं में से ही आये हैं। हाँ, इनमें से कुछ को लेकर इतने विवाद, लांछन, आरोप जन्म लेते रहे हैं कि अब तो मैंने उनकी गिनती करना भी छोड़ दिया है। हालत यह है कि साहित्य अकादमी के “लेखक से मिलिए” कार्यक्रम के लिए एक परिचय-पुस्तिका आनी थी और उन्होंने एक दो लेख ऐसे माँगे जिनमें गम्भीर और तटस्थ होकर मेरे बारे में कुछ कहा गया हो। पचासों लेखों, टिप्पणियों, सम्पादकियों का ध्यान आया, वे पत्रिकाएँ भी याद आयीं जहाँ पूरे-पूरे अंक मेरे तर्पण से भरे थे मगर औसत प्राध्यापकीय शोध-प्रबन्धों को छोड़कर एक भी ऐसा नहीं था जिसे सामान्य पाठक के सामने स्वतन्त्र परिचय के रूप में दिया जा सके। लगभग सारी ही बेहद सामान्य प्रतिक्रियाएँ थीं और उन्हें समझने के लिए आगे-पीछे के सन्दर्भ जानना जरूरी था।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2003 |
| Pulisher |











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