Rangmanch Ka Ek Aur Path
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Description
रंगमंच का एक और पाठ
पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी रंगमंच जिन चुनौतियों के बीच एक नयी पहचान पाने की कोशिश कर रहा है, उसे परम्परागत सैद्धान्तिक अथवा प्रायोगिक पक्षों द्वारा नहीं समझ सकते। रंगमंच के जो नये रूप और स्तर बन रहे हैं, उन्हें समझने के लिए वैकल्पिक या नये दृष्टिकोणों की जरूरत है। इसी परिप्रेक्ष्य में पुराने और नये लेखों की तलाश की गयी है ताकि बुनियादी बदलावों के साथ इस पहचान और आज की जरूरतों को समझ सकें। हमारी आज की कला सांस्कृतिक रूप से विविध तथा तकनीकी रूप से उन्नत तथा बहुआयामी रूपों से साक्षात्कार करती रही है। यहाँ संगीत, नृत्य, प्रदर्शनकारी कलाएँ, मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला और फ़िल्म का प्रमुख रूप से उल्लेख हो सकता है।
नाटक और रंगमंच के साथ ये सारी कलाएँ एक-दूसरे से मिलती-जुलती हुई कला चिन्तन की नयी भाषा बना रही हैं। नतीजा यह है कि नाट्यसमीक्षा भी अनेक शास्त्रों और कलारूपों से सन्दर्भित हो रही है। ये सभी रूप केवल अलंकरण के नहीं दर्शकों में तर्कसंगत सोच पैदा करने के आधार बने हैं। इसे किसी विशेष रूप की संज्ञा नहीं दी जा रही। कहा जा सकता है कि विभिन्न रंग तत्त्वों की विविधता में जो एक तरह की एकता है, वही भारतीय कला की महत्त्वपूर्ण विशेषता है…
– भूमिका से
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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