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Description
रोशनी की शिनाख्त
नदी को आदमी की चिन्ता है और आदमी को विकास की। विज्ञान सोचने वाली मशीन बनाना चाहता कि मनुष्य को सहूलियत हो, लेकिन सत्ता सोच को नियंत्रित करनेवाला यंत्र चाहती है। अफ़सरी है जो अभी भी अपनी पुरातन पटरी पर चली जा रही है। पुलिस की तफ़्तीश है जो पीड़ित को अपराधी-सा अहसास करा रही है।
ऐसी ही और अनेक उलटबाँसियाँ हैं जिन पर ज्ञान चतुर्वेदी के ये व्यंग्य बहुत साफ़, बहुत तीखे ढंग से उँगली रखते हैं। समाज, राजनीति, साहित्य-संस्कृति जहाँ भी कुछ उथला है, छूँछा है, बेईमान और इनसानियत के ख़िलाफ़ है उनकी नज़र से नहीं चूकता।
ये व्यंग्य जो हैं उसकी अक्कासी-भर नहीं करते, बल्कि अपने आसपास के विद्रूप को देखने की दृष्टि भी देते हैं, कभी किसी रूपक में पिरोकर, कभी सीधी टिप्पणियों से। लेकिन यह व्यंग्य सब कुछ को स्याह नहीं दिखाता, जहाँ रोशनी है उसकी शिनाख़्त भी करता है।
‘रोशनी की शिनाख़्त’ व्यंग्य-संग्रह की भूमिका अपने आप में इस प्रस्तुति की उपलब्धि है जिसमें ज्ञान चतुर्वेदी वर्तमान हिन्दी व्यंग्य का अत्यन्त विचारोत्तेजक विश्लेषण करते हुए, देश के मौजूदा समय पर भी एक सार्थक टिप्पणी करते हैं।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2025 |
| Pulisher |











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