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टेलीविजन समीक्षा सिद्धान्त और व्यवहार
टीवी की समीक्षा की कोई सिद्धांतिकी नहीं हो सकती। उसकी यदि कोई सिद्धांतिकी संभव है तो वह चिह्न विज्ञान, डिकंस्ट्रक्शन, संचार-प्रक्रियाओं, प्रभाव प्रक्रियाओं और जनसंचार के अर्थशास्त्र को समग्रता में समझकर ही संभव है। यों टीवी का ‘समीक्षक’ हर दर्शक है, लेकिन टीवी का विमर्श विकसित करना एक व्यावहारिक कार्य है, जो हर वक्त होता रहता है। इसीलिए आप टीवी पर या जनसंचार पर दो किताबें टीप कर तीसरी किताब नहीं बना सकते। मीडिया पर लिखना क्षण का क्षण में लिखना होता है, वह किसी किताब की नकल से नहीं बनता।
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पाठक इन टिप्पणियों में, उनकी प्रस्तुतियों में, वाक्यविन्यासों में एक अपने ही तरह का ‘डिकंस्ट्रक्शन’ पाते हैं। इनमें भाषा की ‘क्रीड़ा’, भाषा की वक्रोक्तियाँ, ध्वनियाँ और सर्वोपरि विजुअल संरचनाओं की ‘हाइपर रीयलिटी’ की विखंडनात्मक रीडिंग ! कभी-कभी गलीछाप, कभी कई शब्दों को तोड़कर एक नया शब्द ‘मारने’ की कला स्वयमपि विकसित होती गई। टीवी जिंदगी से खेलता है, तो हम भी उससे खेलेंगे क्योंकि खेल भाषा ही उसकी आलोचना को संभव कर सकती है। ऐसा लगने लगा। शब्दों के विद्रूप बनाना, स्थितियों की पेरोडी बनाना, एक खास किस्म की ‘पेश्टीच’ की संरचना करना, टीवी एवं रेडियो समीक्षा के लिए अलग शैली की दरकार रखता है। इन टिप्पणियों में बहुत से खेल, बहुत से तनाव, बहुत से विचार और टकराहटें सक्रिय हैं।0
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टीवी समीक्षक के बारे में एक बार लिखा कि टीवी समीक्षक ‘संत’ नहीं हो सकता और ‘अज़दक’ तो कभी ‘संत’ हो ही नहीं सकता था।
Additional information
| Authors | |
|---|---|
| Binding | Hardbound |
| ISBN | |
| Language | Hindi |
| Pages | |
| Publishing Year | 2006 |
| Pulisher |











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