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भारतीय वैक्सीन और विश्व
वैक्सीन को आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धियों में से एक माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, टीकों की वजह से हर साल करीब बीस से तीस लाख लोगों की जान बच पाती है। सी.डी.सी. का कहना है कि बाजार में लाये जाने से पहले टीकों की गंभीरता से जांच की जाती है। पहले प्रयोगशालाओं में और फिर जानवरों पर इनका परीक्षण किया जाता है। उसके बाद ही मनुष्यों पर वैक्सीन का ट्रायल होता है। अधिकांश देशों में स्थानीय दवा नियामकों से अनुमति मिलने के बाद ही लोगों को टीके लगाये जाते हैं। टीकाकरण में कुछ जोखिम जरूर हैं, लेकिन सभी दवाओं की ही तरह, इसके फायदों के सामने वो कुछ भी नहीं। उदाहरण के लिए, बचपन की कुछ बीमारियां, जो एक पीढ़ी पहले तक बहुत सामान्य थीं, टीकों के कारण तेजी से लुप्त हो गई हैं। चेचक जिसने लाखों लोगों की जान ली, वो अब पूरी तरह खत्म हो गई है। लेकिन सफलता प्राप्त करने में अक्सर दशकों लग जाते हैं। वैश्विक टीकाकरण अभियान शुरू होने के लगभग 30 साल बाद अफ्रीका को अकेला पोलियो मुक्त देश घोषित किया गया। यह बहुत लंबा समय है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कोविड-19 के खिलाफ पूरी दुनिया में पर्याप्त टीकाकरण करने में महीनों या संभवतः वर्षों का समय लग सकता है, जिसके बाद ही हम सामान्य स्थिति में लौट सकेंगे।
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